बंद मुट्ठी से रेत सी फिसल रही है जिन्दगी , थोड़ी खुशियां बहुत से ग़मों को ढो रही है जिन्दगी । चाहे अनचाहे रिश्तों को निभा रही है जिन्दगी , क्या खोया क्या पाया ये हिसाब लगा रही है जिन्दगी ।। अतुल कुमार (नि.शि.) @acharyatul · 2026-09-17