रामपुर जेल से रिहा होते ही दरवाज़े पर मौजूद ED ने आज़म ख़ान साहब को गिरफ़्तार कर लिया। उनका दर्द फूटा - “मुसलमान होने की सज़ा है।”
ऐसा सलूक सत्ता की बहादुरी नहीं, सियासी कायरता है!
हुक्मरान याद रखें - कुर्सियाँ हमेशा नहीं रहतीं। जनता की याददाश्त से नाइंसाफ़ी मिटती नहीं। आज के